यूं इन्तज़ार की महफ़िल , सजाए बैठा हूं ।
तमाम जिस्म को , आंखें बनाए बैठा हूं ।।
जो फूल – फूल के चेहरे पै , ताज़गी रख दे ।
इन आंसुओं में , वो मौसम छुपाए बैठा हूं ।।
न पूछिएगा सवेरे की , आरज़ू क्या है ।
के शाम ही से , दिए को बुझाए बैठा हूं ।।
वो बात – बात पै , कहता है बेवफ़ा मुझको ।
मैं अपने होंठों को , पत्थर बनाए बैठा हूं ।
वो इक नज़र में मुझे , ख़ाक कर के रख देगा ।
मैं लाख दिल में समुन्दर छुपाए बैठा हूं ।
वही फ़रेब संवारेगा ,सारी दुनिया को
मैं जो फ़रेब तेरे ग़म का खाए बैठा हूं ।।
किसी की याद ने ये कैसे गुल खिलाए हैं।
हर एक फूल से , नज़रें बचाए बैठा हूं ।।
वफ़ा , खुलूस , मोहब्बत , शऊर , हमदर्दी
मैं अपने जाम में , क्या – क्या मिलाए बैठा हूं।।
ग़ज़ल में ढ़ाल रहा हूं मैं धड़कने ‘ अरुण
‘ये और बात है सर को झुकाए बैठा हूं ।।
अरुण चट्ठा ‘अरुण’