सावन के पहले सोमवार में विशेष पूजन से करें उपासक भगवान शिव को प्रसन्न

आज का सोमवार सावन मास का पहला सोमवार है, जिसका कि भगवान शिव की पूजा में विशेष महत्व माना जाता है। सावन के पहले सोमवार की महत्ता हमारे हिंदु धर्म में सदा से रही है।

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सावन मास में भगवान शिव के लिए सोमवार का व्रत रखना भी भारतीय मान्यताओं में शुभ माना जाता है। वैसे भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हफ्ते का हर दिन किसी विशेष देवी-देवताओं के पूजन से जुड़ा माना जाता है। वहीं इस श्रेणी में सोमवार का दिन भगवान शिव के पूजन के लिए माना जाता है।

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माना जाता है कि सावन मास में लिए गए सोमवार व्रत विशेषकर शिव भगवान को प्रसन्न करते हैं। सावन मास में लिए गए व्रत का मनवांछित फल और मनचाहा जीवनसाथी मिलनी जैसी बातों के लिए महत्व  माना जाता है। श्रावन मास में भगवान शिव के उपासक शिव भगवान की बैकुंठ धामों की यात्रा के लिए निकल पड़ते हैं।

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प्रसिद्ध अमरनाथ यात्रा इस क्रम में इन दिनों चर्चा में है। कावड़ियों की धूम इन दिनों भगवान शिव की विशेष अराधना हेतू यात्रा के लिए सड़कों पर देखी जा सकती है।

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यदि आप भी सावन मास व्रत रखने के इच्छुक हैं तो चलिए आज आप को बताते हैं आप भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा कैसे कर सकते हैं। जानते हैं व्रत की सम्पूर्ण विधीः

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प्रातः काल स्नान आदि कार्यों को पूरा कर घर में ही पूजा वाले स्थान पर पूजन सामग्री की वशेष स्थापना वेदी के साथ करें। यदि घर के पास कोई मंदिर हो तो भगवान शिव के शिवलिंग पर दूध व बेल पत्र चढ़ा कर व्रत का संकल्प लें।

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भगवान शिव के पूजन के लिए आप पूजन की विशेष थाली में पाँच फलों को अवश्य रखें। थाली में पान के पत्ते व बेल के पत्ते गेंदे के फूलों की माला रखें।

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कलावा, धूप, इलायची, लौंग, कुमकुम, धतुरा, मिठाई से थाली को सजाऐं। भगवान शिव की पूजा के साथ ही माता पार्वती के लिए श्रृगांरदान से अपनी थाली की शोभा बढ़ाऐं।

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शिवलिंग को जल से स्नान कराने के बाद भगवान शिव को भोग लगाऐं। भोग के बाद ओम नमः शिवाय जाप के साथ बेल पत्र चढ़ाऐं।

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बेल पत्र के बाद पान के पत्ते व धतुरे व फूलों की माला चढ़ाऐं। भगवान भोले नाथ को कलावा चढ़ाऐं और सुपारी, लौंग इलायची अर्पित करें। मिठाई चढ़ाते हुए श्रृंगार दान भी चढ़ाऐं। पूजन के लिए दिया जलाऐं धूप व अगरबत्ती के साथ भगवान भोले नाथ का तिलक लगाऐं व आरती उतारें।

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घर के पूजन स्थान पर सावन व्रत कथा का पाठ करें और भगवान शिव की आरती के साथ पूजन का प्रसाद वितरण के साथ पूजा का समापन करें। संध्या काल में पूजन के बाद ही भोजन ग्रहण करें।