घर हर व्यक्ति की एक प्राथमिक आवश्यकता में सम्मलित होता है। घऱ सिर्फ ईंटों के मकान को नहीं कहा जा सकता अपितु घर तो वह होता है जहां रिश्तों में आपसी प्यार-सम्मान और खुशियाँ हर पल रहती हों। यह वास्तु शास्त्र का ज्ञान बहुत हद तक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि घर बनाते समय वास्तु का ज्ञान रख लिया जाए तो घर के लिए चार दीवारें भी काफी होती हैं। वास्तु-शास्त्र का महत्व आज के वर्तमान युग में भी उतना ही है जितना पहले हुआ करता था। वास्तु के ज्ञान से घर में सुख-शान्ति के प्रवेश का दरवाजा खुल जाता है।
घर खरीदने या बनाने से पूर्व वास्तु के अनुसार भी इसकी जाँच-परख होना बेहद आवश्यक हो जाता है। घर की दिशा इस मायने में महत्वपूर्ण है।
जानें वास्तु के अनुसार कैसा होना चाहिए आपका घर-

किचन– किसी भी घर में किचन को उस घर का आत्मा कहा जाता है। आखिर यही तो वह स्थान होता है जहाँ परिवार के लिए भोजन पकता है। सही दिशा में बने किचन के खाने से घर के सदस्यों का ना सिर्फ स्वास्थ्य निरोगी रहता है साथ ही अच्छा स्वास्थ्य जीवन में सफलता के आयाम ऊंचे करता है। वास्तु के अनुसार घर का किचन सदैव घर में दक्षिण-पूर्वी स्थान में होना चाहिए। खाना बनाने वाले का मुख पूर्व दिशा की ओर होना बेहतर माना जाता है। घर का यह स्थान सदैव स्वच्छ होना चाहिए साथ ही यदि किचन को मरम्मत की आवश्यकता रहती है तो इसमें बिल्कुल भी देर करना उचित नहीं समझा जाता। झूठे बर्तनों को रात में ही धोना सही है। किचन की दीवारें नीली, हरी और काली कभी नहीं होनी चाहिए।

पूजा घर– यह घर का महत्वपूर्ण स्थान होता है। भगवान की अर्चना जहाँ घर में सुख-समृद्धि लाती है वहीं वास्तु के अनुसार घर में पूजाघर की दिशा का सही होना भी अत्यंत आवश्यक है। घर का मंदिर उत्तर-पूर्वी दिशा की ओर होना चाहिए। वास्तु के अनुसार पूजा-घर के लिए यह दिशा एकदम अनुकूल है।

बेडरूम- यह स्थान घर का वह कक्ष होता है जहाँ हमारा काम के बाद अत्यधिक समय बीतता है। यहाँ जीवन के निज़ी अनुभवों को भी हम जीते हैं। रिश्तों में मीठास, और अनुकूलता के लिए बेहद जरूरी हो कि घर का यह कक्ष वास्तु के अनुकूल हो। वास्तु के अनुसार, घर में बुजुर्गों का कक्ष दक्षिण-पश्चिमी भाग में होना चाहिए तथा युवाओं का उत्तर पश्चिम में होना चाहिए। वास्तु के अनुसार यदि घर के यह कक्ष उत्तर-दक्षिण या पूर्व की तरफ है तो यह सही नहीं है। बेडरूम का सदैव हवादार, खुला होना आवश्यक समझा जाता है जिससे आपमें कभी भी मन संबंधी विकार ना मात्र होने के बराबर होते हैं।

शौचालय- शौचालय का स्थान घर में दक्षिण-पूर्वी या दक्षिण होना वास्तुशास्त्र के अनुकूल माना जाता है। गलत दिशा में शौचालाय होना व्यक्ति में कई परेशानियों और विकारों का कारक बनता है।

सीढ़ियाँ- वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की सीढ़ियाँ सदैव घड़ी की दिशा में बनाई जाना उचित माना जाता है।

खाली स्थान- यदि घर बनाते समय कहीं खाली स्थान छोड़ना चाहते हैं तो उत्तर-पूर्व से लेकर उत्तर पश्चिम तक होना उचित समझा जाता है।