सुप्रीम कोर्ट के चर्चित वकील डॉक्टर ए.पी सिंह ने कहा कि केंद्र और प्रदेश सरकारें मार्च का सेशन खत्म होने के बाद भी ई.डबल्यू.एस का पैसा सितम्बर- अक्तूबर तक नहीं देती। सभी प्राइवेट स्कूल जो किराए के भवनों में चलते हैं वो अपने शिक्षकों की सैलरी, बिजली के बिल और भवन का किराया देने में सक्षम नहीं हैं। कोरोना काल में आर्थिक संकट से जूझ रहे कई स्कूल के मैनेजर आत्म हत्या तक कर चुके हैं। एडवोकेट सिंह ने कहा कि आर.टी.ई एक्ट 2009 के तहत देश के गरीब वंचित समाज के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा के खर्चे का निस्तारण सरकार द्वारा वार्षिक न करके त्रैमासिक किया जाए क्योंकि भारत में चलने वाले अधिकतर स्कूल बजट श्रेणि के होते हैं। जिनके पास कोई सरप्लस फंड नहीं होता।

इसके लिए प्राइवेट लैंड पब्लिक स्कूल ट्रस्ट की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई, जिसमे उन्होंने सरकार से निवेदन किया कि उनके लिए अलग से नीति बनाई जाए, ताकि स्कूल मैनेजरों की आत्म हत्या को रोका जा सके और स्कूलों को सुचारु रूप से चलाया जा सके। एडवोकेट सिंह ने कहा कि सभी बजट स्कूलों को वित्तीय राहत दी जाए या इन कम फीस वाले स्कूलों को उनकी फीस के हिसाब से राहत दी जाए। सरकार से निवेदन है कि इन सभी स्कूलों से डोमेस्टिक शुल्क के हिसाब से बिजली और पानी का चार्ज लिया जाए। ट्रस्ट के राष्ट्रीय संरक्षक हीरालाल पांडे और राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने अपने संयुक्त संबोधन में कहा कि केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार ने ये भेद भाव बंद नहीं किया तो बजट स्कूल ट्रस्ट के बैनर तले आंदोलन करेंगे जिसकी जिम्मेदारी सरकारों की होगी। ट्रस्ट के राष्ट्रीय महासचिव चंद्रकांत सिंह ने संयुक्त रूप से कहा कि सभी बजट स्कूल शिक्षा माफिया का हिस्सा नहीं हैं बल्कि स्थानीय समस्या से निकले लोग हैं। शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार का इतना बड़ा भेद भाव बर्दाश्त नहीं होगा क्योंकि समाज के दबे कुचले, शोषित, पीड़ित वर्ग शिक्षा से वंचित रह जाएगा और स्कूल बंद होते चले जाएंगे जबकि देश में अभी और स्कूल खोलने की जरूरत है जिससे शिक्षा के मूल अधिकार की पूर्ति हो सके और संविधान की रक्षा हो सके।