
वो गर्मियों की छुट्टीयों का, एहसास अलग था
नाना-नानी के घर जानें का, इंतजार अलग था
वो दोस्तों की यारी,दोस्ती में बफादारी
दोस्तों में बफादारी, का एहसास अलग था।।
ना व्हाट्सऐप ना फेसबुक, ना ट्ववीटर पर यारी
वो नाना-नानी के घर जाकर, दोस्त बनाने का एहसास अलग था।।

वो थोड़े से पैसे भी, लाखों से कम नहीं थे,
वो नाना-नानी की कहानियों के किस्से, किसी फिल्मों से कम नहीं थे
उन कहानियों में खोकर खुद को सोचना, किसी हसीन ख़्याब से कम नहीं था
याद आता है वो बचपन जो, इस दिखावटी दुनिया से बेहद अलग था
ना फिक्र थी कमाने की, ना पैसे कम होने का डर था।।

वो गर्मियों की छुट्टीयों का, एहसास अलग था
नाना-नानी के घर जानें का, इंतजार अलग था
वो दोस्तों की यारी,दोस्ती में बफादारी
दोस्तों में बफादारी, का एहसास अलग था।।
Writer- Kalpana Chauhan