बुधवार का दिन भगवान गणेश की पूजा का माना जाता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सभी देवों में सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले गणपति का पूजा में भी सर्वप्रथम स्थान है।

भगवान गणेश के बाल स्वरूप कई कथाऐं आज भी शौक से सुनी या बच्चों के लिए कार्टून-पिक्चर में दिखाई भी जाती हैं।

जहाँ नन्हे गणेश की चतुराई का परिचय महादेव-पार्वती का सात चक्कर लगा विश्व भ्रमण करने की कहानी से मिलता है। वहीं उनकी भोलेपन का परिचय हमें चंद्रमा के गणेश पर हँसने के बाद भी चाँद को चाँदनी लौटा कर मिलता है।

पिछली बार हमने बुधवार के दिन गणेश भगवान के पूजन की विशेष विधी आपके साथ साझा की थी। वहीं आज हम भगवान गजनायक के विवाह की कहानी का परिचय आपसे करवाएंगे।

यह बात तो लगभग सभी लोगों को पता होगी कि भगवान गणेश की दो पत्नियाँ मानी जाती हैं रिद्धी और सिद्धी। लेकिन बहुत ही कम लोगों को भगवान गणेश के विवाह की कहानी के विषय में पता होगा। तो चलिए आज जानते हैं कि क्या वजह थी कि भगवान गणेश को दो-दो स्त्रियों से विवाह कर उन्हें अपनी पत्नी बनाने का निर्णय लेना पड़ेगा।

बुद्धि के देवता गणेश जी वैसे तो बाल ब्रह्माचारी भी माने जाते हैं। पर युवा अवस्था में उनका विवाह दो सुंदर देव कन्याओं रिद्धि-सिद्धि से हुआ। ऐसा माना जाता है कि गणेश जी के दो कन्याओं से विवाह के पीछे उन्हें मिलने वाला श्राप था। यह श्राप गजानन को वृंदा जिसे कि तुलसी के नाम से भी जाना जाता है, ने दिया था।

माना जाता है कि असुरकुल में जन्मी वृदां एक तेजस्वी और रूपवती कन्या थी, जो अपने योग्य वर ढ़ूंढ़ते हुए विनायक जी पर मोहित हो जाती हैं। गणेश जी जब वृंदा के विवाह के प्रस्ताव को ठुकराते हैं तो वृंदा को बहुत दुख पहुँचता है। क्रोध में आकर वृंदा ब्रह्माचारी गणेश को दो विवाह होने का श्राप दे देती है। इसी श्राप के चलते गणेश जी मन से परेशान रहने लगे। उनमें भी विवाह करने की इच्छा जागी। लेकिन समस्या तो यह थी कि गणेश जी के हस्ती मुख और एक-दंत होने के कारण कोई भी सुंदर देव-कन्या गणेश जी से विवाह करने को राज़ी नहीं थी। अपने विवाह में होती देरी और वृंदा के श्राप के कारण गणेश जी मूषक की सहायता से अन्य देवों के विवाह में विघ्न डालने लगे। थक-हार कर देव भगवान ब्रह्मा के पास पहुँचे। तब भगवान ब्रह्मा ने अपनी दो पुत्रियों को उत्पन्न किया। देवों के विवाह में विघ्न उत्पन्न ना हो इसके लिए ब्रह्मा ने गजानन का ध्यान विचलित करने हेतु रिद्धी-सिद्धी को शिक्षा देने का कार्य सौंप दिया।

मूषक जब भी गणेश जी के पास देवों की विवाह की कोई सूचना लेकर आता, रिद्धी-सिद्धी अन्य बातों में गणेश जी ध्यान उलझा देतीं। गणेश जी को ब्रह्मा की युक्ति समझ आई तो ब्रह्मा जी ने स्वयं रिद्धी-सिद्धी से गजानन के विवाह का प्रस्ताव उनके समक्ष रख दिया। इस प्रकार बड़ी ही धूम-धाम से गणेश जी का रिद्धी-सिद्धी रूपवती कन्याओं से विवाह हुआ।

जिनसे गजानन को दो पुत्र शुभ-लाभ की प्राप्ति भी हुई।