देश के उत्तर और उत्तर पूर्वी राज्यों से जुड़ी धार्मिक पूजा छठ पूजा का आगाज़ हो चुका है। छठ पूजा सुर्य भगवान को अर्पित एक कठिन पूजा मानी जाता है। बिना अन्न जल लिए छठ की यह कठिन पूजा देश में हर्षोल्लास से मनाई जाती है। दिवाली के बाद छठ का विशेष इंतज़ार भक्तों द्वारा किया जाता है। महिलाओं ने छठ पूजा की विशेष तैयारियाँ लगभग कर ली हैं।

बीते गुरुवार छठ पूजा का आरंभ नहाय-खाय से हो चुका है। बीते गुरुवार ही महिलाओं ने गेंहू के आटे की रोटियाँ बनाकर उसे चने की दाल, लौकी और चावल के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। इसके बाद छठ अनुष्ठान की भी अन्य तैयारियाँ कर ली गयी हैं।

व्रत का शुभांरभ का बीते गुरूवार को ही हो चुका है। आज इस महाव्रत का दूसरा दिन है। इस मुख्य पूजा में नऐ चुल्हे को लीप-पोथ कर तैयार कर नए बर्तनों में गुड़ की खीर बनाई जाती है। बता दें इसी गुड़ की खीर का सेवन विशेष तौर पर पूजा के दिनों में महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसी खीर को ग्रहण करने के बाद महिलाऐं कठिन निर्जला व्रत का प्राणायान लेती हैं।

इस खास पर्व की रौनक बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्यों में देखने को मिलती है। अगले चार दिनों तक भक्त छठ मय्या व सुर्य देवता की उपासना करेंगे।

कार्तिक शुक्ल छठ से प्रारंभ हुआ छठ महोत्सव चार दिनों तक चलेगा। इसका पहला दिन नहाय-खाय से और दूसरा दिन खरना से होता है। मन की शुद्धिकरण करते हुए एक समय का भोजन का ग्रहण किया जाता है।

इसी शुद्धिकरण को पूरा अगले दिन की खरना पूजा से किया जाता है। खरना पूजा के लिए विशेष गुड़ की खीर को चुल्हे पर आम की लकड़ी के ईंधन से पकाया जाएगा। खरना पूजा में एक बार का भोजन ग्रहण कर लेने के बाद व्रती दिनभर निराहार रहता है। शाम और सुबह सुर्य देवता का अर्ध्य देने के बाद ही व्रत का परायण किया जाता है।

छठ पूजा का यह महापर्व प्रकृति से प्रेम का भी त्योहार माना जाता है। इस चार दिवसीय पूजा में प्रकृति के प्रति विशेष प्रेम दर्शाते हुए प्रकृति की वस्तओं का प्रयोग किया जाता है। पूजा में मौसम की फसलों का ही प्रयोग किया जाता है। नई फसल के तौर पर प्रसाद में गन्ने को भी शामिल किया जाता है। गुड़ और आटे के मिश्रण से ठेकुआ विशेष भोग बनाया जाता है।

इस महापर्व से अनेकों कहानियों जुड़ती हैं। लेकिन छठ पूजा की विशेष उत्पत्ति माता अदिति की कहानी से जुड़ती है।

पारंपरिक कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में जब देवता हार गए तो देव माता अदिति ने पुत्र प्राप्ति के लिए देव के जंगलों मे छठी मय्या की विशेष अराधना की थी। अदिति माता की विशेष पूजा से प्रसन्न होकर माता छठ ने अदिति को पराक्रमी पुत्र पैदा होने का आशीर्वाद दिया। माता अदिति के इसी पराक्रमी पुत्र ने देवतागणों की अंततः विजय दिलवाई। तभी से यह मान्यता है कि छठ माता की पूजा-अर्चना से सभी दुखों का निवारण स्वतः ही हो जाता है।