याद आता है मुझे वो शहर मेरे बचपन का
जहां लोग अपने से रहा करते थे
जब मिलते थे मुझसे
तब अपनी सी बात किया करते थे।।
अब तो बस उस शहर में जान-पहचान सी लगती है,
कभी जाता हूं उस शहर मैं तो हर गली अंनजान सी लगती है।
फिर से उस नुक्कड़ पर खड़े हो जाते हैं मेरे वो दोस्त पुरानें
फिर से वो मोड़ अपना सा लगता है
फिर से वो शहर अपना सा लगता है।।
खड़ा हो जाता हूं फिर से उस शहर की सड़क पर
तो हर हलचल पहले जैसी लगती है
आज के इस नये शहर में भी
वो पुरानी बात झलकती है।।
याद आता है मुझे वो शहर मेरे बचपन का
जहां लोग अपने से रहा करते थे
जब मिलते थे मुझसे
तब अपनी सी बात किया करते थे।।
Writer – kalpana Chauhan