क्यों कि भारतीय एथलीट दुती का मामला समाज का गंभीर मुद्दा

हाल ही में भारतीय एथलीट दुती चंद ने होमोसेक्सुअलिटि यानि समलैंगिक रिश्तों जैसे मुद्दे पर अपनी व्यक्तिगत राय रखी। दुती ने ना सिर्फ अपनी राय रखी बल्कि साथ ही उन्होनें अपने निजी जीवन से जुड़ी बातों को भी दुनिया के सामने उजागर किया। एशियाई खेलों में देश के लिए मेडल लाने वाली  तेज धावक दुती चंद ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर दिया जब इन्होंने खुद अपने होमोसेक्सुअल रिलेशन में होने की बात कबूली।

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हालांकि होमोसेक्सुअलिटी जैसे मुद्दे देश में नए नहीं हैं लेकिन कहीं ना कहीं ऐसे मुद्दों से जुड़े व्यक्ति हमारा ध्यान अपनी ओर एक पल के लिए ही सही पर आकर्षित कर ही जाते हैं।

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लड़के का लड़के से या लड़की का लड़की से रिश्ता होना या कहा जाए एक ही लिंग के लोगों में प्यार जैसे रिश्तों का पनपना समाज से बहिष्कार करने जैसे मुद्दों का रूप ले लेता था। हालांकि जब से देश में इस समुदाय के लिए धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक श्रेणी से हटाया है, समाज में ऐसे समुदाय सशक्त हुऐ हैं।

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ऐसा नहीं है कि यह मुद्दा कोई मॉर्डन मुद्दा हो, ऐसे रिश्ते समाज में पहले भी पनपते थे। फर्क सिर्फ इतना ही था कि यह सब पहले छुपा था। ऐसे रिश्तों का छुपा होना कहीं ना कहीं समाज में शर्मिंदा होने से बचना था।

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पहले यदि ऐसे रिश्ते किसी के समक्ष आ भी जाया करते थे तो इसे बीमारी का नाम दे दिया जाता था। और समाज से व्यक्ति को बहिष्कृत करने जैसी नौबत आ जाती थी। जबकि मॉर्डन होते होते लोगों ने एक म़ॉर्डन सोच को भी जन्म दिया कि एक ही लिंग में प्रेम भावना का पनपना कोई बीमारी नहीं है। यह भी प्राकृतिक है। इसके पीछे किसी व्यक्ति विशेष को तो दोष दिया ही नहीं जा सकता।

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वहीं हमारी मॉर्डन सोच जब जीवनसाथी चुनने जैसे अधिकार को जीवन जीने जैसे अधिकार का एक जरूरी हिस्सा मानती है तो ऐसे समुदाय पर क्यूं समाज अपने फैसलों को थोपे??

किसी व्यक्ति को क्या खाना पसंद है, कहाँ घूमना पसंद है, क्या पहनना पसंद है यह उसकी खुद की मर्जी होती है इस फैसले में हम उसके जीवनसाथी को लेकर चुनाव को भी शामिल कर ही सकते हैं।

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व्यक्ति विशेष के निजी जीवन से जुड़े फैसलों पर उसका स्वयं का और ज्यादा से ज्यादा उसके परिवार का हस्तक्षेप होना चाहिए। इसमें सामाजिक हस्तक्षेप की आवश्यकता तो महसूस ही नहीं होती।

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वहीं जब ऐसे मुद्दों का संबंध सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े पद पर बैठे व्यक्ति से हो तो सभी का ध्यान उस ओर जाना स्वभाविक होता है। जैसा कि यहाँ भारतीय एथलीट दुती चंद का मामला है। दुती चंद एक अच्छी धावक हैं, उन्होंने गरीब परिवार से होते हुए भी संसाधनों के अभाव में देश का नाम अपनी मेहनत से रोशन किया है। वहीं इस बात में भी कोई शक नहीं कि आगे भी वह देश को उन पर गर्व करने के अनेकों अवसर देंगी।

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प्रश्न यह उठता है कि देश की इस तेज धावक का अपने जीवन से जुड़े निजी विषय पर सामने आना, क्या उनके भारतीय एथलीट के जीवन को प्रभावित करेगा?

आप अपनी राय इस मुद्दे पर कमेंट के जरिए, खुलकर रख सकते हैं। समाज से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर समाज की राय ही मायने रखती है, इसलिए अपनी राय जरूर रखें।

3 Comments

  1. किसी भी व्यक्ति की निजी जीवन से जुड़ी बातें जब समाज में आती है तो समाज के वभिन्न विचारधारा के लोगो की राय या तो उनके पक्ष में होती है या उनके विरोध में ।मेरा मानना है कि तेज धावक के द्वारा उनकी निजी जीवन की बाते जब समाज में सार्वजनिक की जाती है तो कहीं न कही एक और बदलते परिवेश में उनकी अपनी विचार को मजबूती प्रदान करती । एक खिलाड़ी होने के साथ साथ वह एक नारी भी ।नारी या पुरुष के द्वारा भारतीय परिवेश में इस तरह की विचार की भारतीय संस्कृति में समाहित नहीं है । बदलते दौर में इस तरह के विचार की सम्मान की जानी चाहिए जिससे कि उन्हें और बल मिल सके और अपनी विचार के कारण उन्हें समाज में अलग पहचान मिल सके।

  2. Homosexuality, a new way for those who think being in a relationship with someone is against the law 💖but we all had legal marriage of homosexual.

  3. संकट यह है कि हमारी न्यायपालिका में और मंत्रिमंडल में ऐसी विभूतियों का अभाव नहीं है जो मानते हैं कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत मूर्खता है या कि मोर की संतान उसके आंसुओं से पैदा होती है! इनसे यह अपेक्षा व्यर्थ है कि यह विज्ञान के आलोक में तर्कसंगत फ़ैसला कर सकते हैं.

    अपने धार्मिक विश्वास (अंधविश्वास) से ऊपर उठकर क़ानूनों की सामाजिक उपयोगिता के अनुसार संवैधानिकता तय की जा सकती है. अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वाला भारत किसी भी धर्म की मान्यता के अनुसार क़ानून बना या लागू नहीं कर सकता.

    यह मुद्दा सिर्फ़ समलैंगिकों के अधिकारों तक सीमित नहीं, क़ानून के राज और क़ानून के सामने समानता के बुनियादी अधिकार से जुड़ा है, क्या समलैंगिक लोग भारत के नागरिक नहीं हैं कि उन्हें क़ानून से बुनियादी सुरक्षा मिले?

    बहरहाल अदालत के फ़ैसले के बाद भी अधिकांश लोग शायद इस डर से चुप हैं कि अगर उन्होंने धारा 377 के उन्मूलन का समर्थन किया तो लोग इन्हें ही समलैंगिक समझने लगेंगे!

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