
गणेश चतुर्थी क्या है – सकट चौथ के दिन भगवान गणोश का पूजन और व्रत किया जाता है, इसे माघी चौथ या तिलकुट चौथ के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने वालों के सभी संकट दूर होते हैं। इसलिए इसे संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। शास्त्रों की मानें तो इस दिन जमीन में उगने वाली चीजें नहीं खानी चाहिए जैसे- मूली, प्याज, गाजर, चुकंदर। मान्यता है कि इस दिन मूली खाने से धन की हानि होती है।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि- सकट चौथ के दिन सुबह उत्तर दिशा में मुंह करके भगवान गणेश को जल चढ़ाने का विधान है। ऐसा करने से पूरे परिवार के कष्ट दूर होते हैं।
घर पर गणेश जी की पूजा कैसे करें– सूर्यास्त के बाद चांद को तिल, गुड़ आदि से अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद ही आपको व्रत खोलना चाहिए। आज के दिन तिल से बनी चीजें खानी चाहिए। साथ ही इस दिन तिल का दान भी उत्तम माना गया है।हो सके तो इस दिन गणेश जी को दुर्वा घास चढ़ानी चाहिए। ऐसा करने से गणेशजी प्रसन्न होते हैं और आपको मान-सम्मान की प्राप्ति होता है साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि आती है। बता दें कि भूलकर भी गणेश जी को तुलसी का पत्ता ना चढ़ाएं क्योंकि दोनों ने एक-दूसरे को शाप दिया था। इसलिए भगवान गणेश की कृपा पाना चाहते हैं तो हमेशा इस बात का ध्यान रखें और तुलसी दल को कभी भी गणेश जी की पूजा में शामिल ना करें।
सकट चौथ कथा– किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने बर्तन बनाकर आंवां लगाया तो आंवां नहीं पका। परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला कि महाराज न जाने क्या कारण है कि आंवां पक ही नहीं रहा है। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा। राजपंडित ने कहा, ”हर बार आंवां लगाते समय एक बच्चे की बलि देने से आंवां पक जाएगा।” राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इस तरह कुछ दिनों बाद एक बुढि़या के लड़के की बारी आई। बुढि़या के एक ही बेटा था तथा उसके जीवन का सहारा था, पर राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुखी बुढ़िया सोचने लगी, ”मेरा एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझ से जुदा हो जाएगा।” तभी उसको एक उपाय सूझा। उसने लड़के को सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ”भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।”
सकट के दिन बालक आंवां में बिठा दिया गया और बुढि़या सकट माता के सामने बैठकर पूजा प्रार्थना करने लगी। पहले तो आंवां पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवां पक गया। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया। आंवां पक गया था और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली। तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है।