घर घर में आज नवरात्रे के पावन अवसर पर माता के दिव्य स्वरूप शैलपुत्री का पूजन होगा। शैलपुत्री माता को, दुर्गा का प्रथम दिव्य स्वरूप माना जाता है। नौ नवरात्री में माता के नौ दिव्य स्वरूपों के पूजन का महत्व विशेष रहता है।
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माता के हर स्वरूप की एक अलग कहानी और महत्व माता के दिव्य महिमा के साथ प्रख्यात है।
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तो चलिए आज जानते हैं माता के इस आलौकिक अवतार की कहानी। धार्मिक कहानियों में माता शैलपुत्री के जन्म की कहानी राजा दक्ष प्रजापति के महायज्ञ से जुड़ती है। कहा जाता है कि राजा दक्ष ने एक बार एक महायज्ञ का आयोजन रखा।

सभी देवी-देवताओं को राजा दक्ष की ओर से निमंत्रण जाता है, लेकिन वे भगवान भोले नाथ को आमंत्रण नहीं भेजते। कारण मुख्य यही था कि राजा दक्ष जटाधारी शिव को दामाद के रूप में पसंद नहीं करते थे।

यहाँ माता सती को पिता के यहाँ महायज्ञ होने की सूचना ही मिलती है कि वह भगवान भोले नाथ के मना करने के बावजूद पिता के यहाँ पहुँच जाती है। पिता के घर पति का अपमान सहन ना कर माता क्रोध में यज्ञ को नष्ट कर देती हैं।
इतना ही नहीं माता सती स्वयं को भी यज्ञ वेदी में भस्म कर लेती हैं। सती माता के इस त्याग के पश्चात ही उनका अगला जन्म शैलराज हिमालय के घर होता है। राजा शैलराज की यह पुत्री ही शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं।
माता शैलपुत्री के दैविक स्वरूप की बात करें तो वे बैल पर सवार रहती हैं। माता सती का यह आलौकिक रूप हाथ में त्रिशूल और दूजे हाथ में कमल धारण किये होती हैं। माता के इस दिव्य स्वरूप में उनके माथे पर चंद्रमा की चाँदनी भी शोभायान होती है।
माता शैलपुत्री के पूजन की विधी क्या होनी चाहिएः

नवरात्री के इस पावन अवसर पर घट स्थापना से ही पूजन की सही शुरूआत मान जाती है। घट स्थापना के बाद ही दुर्गा माता के व्रत का संकल्प करें।

माता के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की विधी विधान से पूजा अर्चना करें। माता को अक्षत, सिंदूर, धूप, गंध, पुष्प अर्पित कर माता के मंत्रों का उच्चारण करें।

गाय के घी से दीपक नवरात्रों के इस पावन अवसर अत्यंत शुभ माना जाता है। इसलिए घी का दीपक माता के मंदिर में जलाएं।
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माता के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री को शांति व उत्साह की देवी माना जाता है। वह भय का नाश करने वाली और भक्तों को य़श कीर्ति, धन विद्या, मोक्ष की दात्री के रूप में पूजा जाता है।

माता का यह दिव्य स्वरूप मन की अस्थिरता को दूर कर शांति और नवसंचार की दात्री है।
दिन भर में आज घट स्थापना के चार शुभ सुअवसर चौघड़िया बन रहे हैं। इस शुभ अवसरों को भी जान लेते हैं-
सुबह साढ़े 7 बजे से लेकर 9 बजे तक चर चौघड़िया
सुबह 9 बजे से साढ़े 10 बजे तक लाभ चौघड़िया
सुबह साढ़े 10 से 12 बजे तक अमृत चौघड़िया
दोपहर डेढ़ बजे से 3 बजे तक शुभ चौघड़िया
नवरात्रे के प्रथम दिवस पर घट स्थापना आप अपनी सुविधा के अनुसार चौघड़िया के शुभ मुहूर्तों में कर सकते हैं।