‘सच्चा परोपकार’
बड़े-बड़े कुछ लोग यहाँ, निर्धन को नोंच के खाते हैं। कर भण्डारे बड़े-बड़े फिर परोपकार बतलाते हैं। स्त्री जाति को नित ही जो, छींटाकशी करके [Read More]
बड़े-बड़े कुछ लोग यहाँ, निर्धन को नोंच के खाते हैं। कर भण्डारे बड़े-बड़े फिर परोपकार बतलाते हैं। स्त्री जाति को नित ही जो, छींटाकशी करके [Read More]
ग़ज़ल हमारे प्यार का परचम तेरे दिल पे नहीं फहरा जहाँ चाहा चमन हमने वहीं पे हो गया सहरा गला मैं फाड़ कर रोया सुना [Read More]
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