बड़े-बड़े कुछ लोग यहाँ,
निर्धन को नोंच के खाते हैं।
कर भण्डारे बड़े-बड़े फिर
परोपकार बतलाते हैं।
स्त्री जाति को नित ही जो,
छींटाकशी करके सताते हैं।
पूजा-पाठ हनुमान की कर
वो परोपकारी बन जाते हैं।
माँ-बाबा को भूखा रखकर,
जो खूब दान बरसाते हैं।
ऐसे भी कुछ लोग जहाँ में,
परोपकारी कहलाते हैं।
अपने हिस्से का दान जो करदे,
ऐसे महान कहाँ पाते हैं।
मात-पिता और बहनें ऐसा,
“सच्चा परोपकार”निभाते हैं।
दीपा दीदी प्रजापति
मेरठ, उत्तरप्रदेश