ग़ज़ल
हमारे प्यार का परचम तेरे दिल पे नहीं फहरा
जहाँ चाहा चमन हमने वहीं पे हो गया सहरा
गला मैं फाड़ कर रोया सुना तूने नहीं फिर भी
बना तू मतलबी या फिर सनम तू हो गया बहरा
तेरे बेगानेपन से दर्द बढता ही रहा हरदम
तुम्हारी बेरुखी से ही जखम होता रहा गहरा
तेरी कालिख समझ पाया नही मैं इसलिए जानम
बहुत भोला सा दिखता था तेरा मासूम सा चेहरा
तुम्हारा जाता क्या पर मेरे को कुछ चैन आ जाता
मेरे तपते बदन पे देते अपनी जुल्फ़ जो घहरा
अभी आजा ए जानेमन पता क्या कल का दुनियाँ में
किसी के वास्ते क्या आज तक है यह समय ठहरा
ग़ज़लराज औरैया उत्तरप्रदेश
waoooo superb sher
Very nice 👍👍
ख़ूब
Nice
Superb
Awesome