ग़ज़ल
ख़ुशी हासिल नहीं है अब ख़ुशी में ,
न जाने क्या हुआ है ज़िन्दगी में ।
बहुत कम उम्र आयी काम मेरे,
ज़ियादातर गुज़ारी गुमशुदी में।
अमीरी में बड़ी पाबंदियाँ हैं ,
बड़े बेफ़िक्र थे हम मुफ़लिसी में।
खुला दर था सभी कुछ था सलामत,
बड़े धोखे मिले हैं चौकसी में ।
बता उस दुश्मनी से भी मिला क्या,
बदल कर देखते हैं दोस्ती में ।
बुढ़ापा साथ है और हम अकेले,
जवानी छोड़ आये किस गली में ।
निभाया ही नहीं है साथ उसने,
जिये, जीते रहे बस बेबसी में ।
किशन स्वरूप
बहुत लाज़वाब